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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
कामाल्लोभाच्च धर्मस्य प्रवृत्तिं यो न पश्यति |  ३४   क
स वध्यः सर्वभूतानां प्रेत्य चेह च दुर्मतिः ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति