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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
व्यक्तं ते विदितो राजन्नर्थो द्रव्यपरिग्रहः |  ३५   क
प्रकृतिं चापि वेत्थास्य विकृतिं चापि भूय़सीम् ||  ३५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति