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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
विदितश्चैव ते धर्मः सततं चरितश्च ते |  ४४   क
जानते त्वय़ि शंसन्ति सुहृदः कर्मचोदनाम् ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति