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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रजापालनसम्भूतं फलं तव न गर्हितम् |  ५३   क
एष ते विहितो राजन्धात्रा धर्मः सनातनः ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति