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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
स क्षात्रं हृदय़ं कृत्वा त्यक्त्वेदं शिथिलं मनः |  ५५   क
वीर्यमास्थाय़ कौन्तेय़ धुरमुद्वह धुर्यवत् ||  ५५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति