वन पर्व  अध्याय ३४

वैशम्पाय़न उवाच

न हि केवलधर्मात्मा पृथिवीं जातु कश्चन |  ५६   क
पार्थिवो व्यजय़द्राजन्न भूतिं न पुनः श्रिय़म् ||  ५६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति