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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
जिह्वां दत्त्वा वहूनां हि क्षुद्राणां लुव्धचेतसाम् |  ५७   क
निकृत्या लभते राज्यमाहारमिव शल्यकः ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति