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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
भ्रातरः पूर्वजाताश्च सुसमृद्धाश्च सर्वशः |  ५८   क
निकृत्या निर्जिता देवैरसुराः पाण्डवर्षभ ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति