वन पर्व  अध्याय ३४

वैशम्पाय़न उवाच

सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन्सुवलवानपि |  ६१   क
न प्रमाणेन नोत्साहात्सत्त्वस्थो भव पाण्डव ||  ६१   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति