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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
अर्थेन तु समोऽनर्थो यत्र लभ्येत नोदय़ः |  ६४   क
न तत्र विपणः कार्यः खरकण्डूय़ितं हि तत् ||  ६४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति