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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
अमित्रं मित्रसम्पन्नं मित्रैर्भिन्दन्ति पण्डिताः |  ६६   क
भिन्नैर्मित्रैः परित्यक्तं दुर्वलं कुरुते वशे ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति