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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
सत्त्वेन कुरुते युद्धं राजन्सुवलवानपि |  ६७   क
नोद्यमेन न होत्राभिः सर्वाः स्वीकुरुते प्रजाः ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति