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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
सर्वथा संहतैरेव दुर्वलैर्वलवानपि |  ६८   क
अमित्रः शक्यते हन्तुं मधुहा भ्रमरैरिव ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति