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वन पर्व
अध्याय २८२
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मार्कण्डेय़ उवाच
तावाश्रमान्नदीश्चैव वनानि च सरांसि च |  ३   क
तांस्तान्देशान्विचिन्वन्तौ दम्पती परिजग्मतुः ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति