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वन पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
सृञ्जय़ैः सह कैकेय़ैर्वृष्णीनामृषभेण च |  ८५   क
कथं स्विद्युधि कौन्तेय़ राज्यं न प्राप्नुय़ामहे ||  ८५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति