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विराट पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
धनुष्यनवरश्चासीत्तस्य शिष्यो महात्मनः |  १३   क
दृष्टपूर्वो मय़ा वीर चरन्त्या पाण्डवान्प्रति ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति