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वन पर्व
अध्याय ७३
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वृहदश्व उवाच
दमय़न्त्यैवमुक्ता सा जगामाथाशु केशिनी |  ६   क
निशाम्य च हय़ज्ञस्य लिङ्गानि पुनरागमत् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति