विराट पर्व  अध्याय १३

वैशम्पाय़न उवाच

का देवरूपा हृदय़ङ्गमा शुभे; आचक्ष्व मे का च कुतश्च शोभना |  ७   क
चित्तं हि निर्मथ्य करोति मां वशे; न चान्यदत्रौषधमद्य मे मतम् ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति