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उद्योग पर्व
अध्याय ३४
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धृतराष्ट्र उवाच
जाग्रतो दह्यमानस्य यत्कार्यमनुपश्यसि |  १   क
तद्व्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलः शुचिः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति