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वन पर्व
अध्याय २६४
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मार्कण्डेय़ उवाच
प्रतिजज्ञे च काकुत्स्थः समरे वालिनो वधम् |  १४   क
सुग्रीवश्चापि वैदेह्याः पुनरानय़नं नृप ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति