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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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भीष्म उवाच
नैतदन्येन शक्यं हि वक्तुं केनचिदद्य वै |  ५   क
वक्ता वृहस्पतिसमो न ह्यन्यो विद्यते क्वचित् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति