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वन पर्व
अध्याय २८३
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मार्कण्डेय़ उवाच
चक्षुष्मन्तं च तं दृष्ट्वा राजानं वपुषान्वितम् |  ८   क
मूर्धभिः पतिताः सर्वे विस्मय़ोत्फुल्ललोचनाः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति