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कर्ण पर्व
अध्याय ४९
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कृष्ण उवाच
प्राणात्यये विवाहे वा सर्वज्ञातिधनक्षय़े |  ५३   क
नर्मण्यभिप्रवृत्ते वा प्रवक्तव्यं मृषा भवेत् |  ५३   ख
अधर्मं नात्र पश्यन्ति धर्मतत्त्वार्थदर्शिनः ||  ५३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति