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शल्य पर्व
अध्याय ७
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सञ्जय़ उवाच
तामाशां हृदय़े कृत्वा समाश्वास्य च भारत |  १७   क
मद्रराजं च समरे समाश्रित्य महारथम् |  १७   ख
नाथवन्तमथात्मानममन्यत सुतस्तव ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति