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उद्योग पर्व
अध्याय ३४
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विदुर उवाच
सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुञ्जते सदा |  ४८   क
क्षुत्स्वादुतां जनय़ति सा चाढ्येषु सुदुर्लभा ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति