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वन पर्व
अध्याय १८५
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मार्कण्डेय़ उवाच
यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा |  २४   क
तत एनमिदं वाक्यं स्मय़मान इवाव्रवीत् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति