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वन पर्व
अध्याय ५८
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वृहदश्व उवाच
येषां प्रकोपादैश्वर्यात्प्रच्युतोऽहमनिन्दिते |  १७   क
प्राणय़ात्रां न विन्दे च दुःखितः क्षुधय़ार्दितः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति