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द्रोण पर्व
अध्याय ३४
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सञ्जय़ उवाच
महौघाः सलिलस्येव गिरिमासाद्य दुर्भिदम् |  ८   क
द्रोणं ते नाभ्यवर्तन्त वेलामिव जलाशय़ाः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति