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कर्ण पर्व
अध्याय ३४
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सञ्जय़ उवाच
ईदृशं नास्य रूपं मे दृष्टपूर्वं कदाचन |  १३   क
अभिमन्यौ हते कर्ण राक्षसे वा घटोत्कचे ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति