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द्रोण पर्व
अध्याय १४७
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सञ्जय़ उवाच
एष भीमो रणश्लाघी वृतः सोमकपाण्डवैः |  २८   क
रुषितोऽभ्येति वेगेन द्रोणकर्णौ महावलौ ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति