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विराट पर्व
अध्याय ५०
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अर्जुन उवाच
पश्चादेष प्रय़ातव्यो न मे विघ्नकरो भवेत् |  २२   क
एतेन युध्यमानस्य यत्तः संय़च्छ मे हय़ान् ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति