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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
एवं सन्दिश्य तु प्रेष्यान्वलदेवो महावलः |  १८   क
तीर्थय़ात्रां यय़ौ राजन्कुरूणां वैशसे तदा |  १८   ख
सरस्वतीं प्रतिस्रोतः समुद्रादभिजग्मिवान् ||  १८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति