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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
ऋत्विग्भिश्च सुहृद्भिश्च तथान्यैर्द्विजसत्तमैः |  १९   क
रथैर्गजैस्तथाश्वैश्च प्रेष्यैश्च भरतर्षभ |  १९   ख
गोखरोष्ट्रप्रय़ुक्तैश्च यानैश्च वहुभिर्वृतः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति