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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
विमुक्तशापः पुनराप्य तेजः; सर्वं जगद्भासय़ते नरेन्द्र |  ३७   क
एवं तु तीर्थप्रवरं पृथिव्यां; प्रभासनात्तस्य ततः प्रभासः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति