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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
ततस्तस्यां स भगवान्प्रीतिं चक्रे निशाकरः |  ४३   क
सास्य हृद्या वभूवाथ तस्मात्तां वुभुजे सदा ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति