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वन पर्व
अध्याय २८
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वैशम्पाय़न उवाच
यो देवांश्च मनुष्यांश्च सर्पांश्चैकरथोऽजय़त् |  २७   क
तं ते वनगतं दृष्ट्वा कस्मान्मन्युर्न वर्धते ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति