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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
ताश्च सर्वाव्रवीद्दक्षो गच्छध्वं सोममन्तिकात् |  ४८   क
समं वत्स्यति सर्वासु चन्द्रमा मम शासनात् ||  ४८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति