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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
अनादृत्य तु तद्वाक्यं दक्षस्य भगवाञ्शशी |  ५२   क
रोहिण्या सार्धमवसत्ततस्ताः कुपिताः पुनः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति