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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
स यक्ष्मणाभिभूतात्माक्षीय़ताहरहः शशी |  ५६   क
यत्नं चाप्यकरोद्राजन्मोक्षार्थं तस्य यक्ष्मणः ||  ५६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति