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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
इष्ट्वेष्टिभिर्महाराज विविधाभिर्निशाकरः |  ५७   क
न चामुच्यत शापाद्वै क्षय़ं चैवाभ्यगच्छत ||  ५७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति