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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षीय़माणे ततः सोमे ओषध्यो न प्रजज्ञिरे |  ५८   क
निरास्वादरसाः सर्वा हतवीर्याश्च सर्वशः ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति