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वन पर्व
अध्याय १६१
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वैशम्पाय़न उवाच
क्रीडाप्रदेशांश्च समृद्धरूपा; न्सुचित्रमाल्यावृतजातशोभान् |  ६   क
मणिप्रवेकान्सुमनोहरांश्च; यथा भवेय़ुर्धनदस्य राज्ञः ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति