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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
मासार्धं च क्षय़ं सोमो नित्यमेव गमिष्यति |  ६८   क
मासार्धं च सदा वृद्धिं सत्यमेतद्वचो मम ||  ६८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति