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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
स विसृष्टो महाराज जगामाथ स्वमालय़म् |  ७४   क
प्रजाश्च मुदिता भूत्वा भोजने च यथा पुरा ||  ७४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति