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शल्य पर्व
अध्याय ३४
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वैशम्पाय़न उवाच
अतश्चैनं प्रजानन्ति प्रभासमिति भूमिप |  ७७   क
प्रभां हि परमां लेभे तस्मिन्नुन्मज्ज्य चन्द्रमाः ||  ७७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति