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शान्ति पर्व
अध्याय ३४०
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भीष्म उवाच
न ह्यस्त्यविदितं लोके देवर्षे तव किञ्चन |  ९   क
श्रुतं वाप्यनुभूतं वा दृष्टं वा कथय़स्व मे ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति