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शान्ति पर्व
अध्याय ३४२
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व्राह्मण उवाच
गृहस्थधर्मं विप्रेन्द्र कृत्वा पुत्रगतं त्वहम् |  २   क
धर्मं परमकं कुर्यां को हि मार्गो भवेद्द्विज ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति