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शान्ति पर्व
अध्याय ३४३
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अतिथिरु उवाच
यत्र पूर्वाभिसर्गेण धर्मचक्रं प्रवर्तितम् |  २   क
नैमिषे गोमतीतीरे तत्र नागाह्वय़ं पुरम् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति