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शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
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नागभार्यो उवाच
साहं धर्मं विजानन्ती धर्मनित्ये त्वय़ि स्थिते |  ११   क
सत्पथं कथमुत्सृज्य यास्यामि विषमे पथि ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति