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शान्ति पर्व
अध्याय ३४७
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नागभार्यो उवाच
सप्ताष्टदिवसास्त्वद्य विप्रस्येहागतस्य वै |  १३   क
स च कार्यं न मे ख्याति दर्शनं तव काङ्क्षति ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति