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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
म्लेच्छभूतं जगत्सर्वं भविष्यति युधिष्ठिर |  ४५   क
न श्राद्धैर्हि पितॄंश्चापि तर्पय़िष्यन्ति मानवाः ||  ४५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति